माँ देवी शाकम्भरी दुर्गा माँ के अवतारों में से एक है। धार्मिक मान्यताओ के अनुसार माँ शाकम्भरी मानव जगत के कल्याण हेतु पृथ्वी लोक पर आई थी। माँ शाकम्भरी की महिमा का वर्णन वेदो में इस तरह उल्लेखित है।

 

शारणागत दीनात् परित्राण परायणे,

सर्वस्यर्ति हरे देवी नारायणी नामोस्तुते।’

 

माँ शाकम्भरी नवरात्रि का शुभारम्भ पौष माह में शुक्ल पक्ष की सप्तमी को होती है और माँ शाकम्भरी नवरात्रि का समापन पौष पूर्णिमा के दिन होती है। वेदो, पुराणो और शास्त्रो के अनुसार पौष माह की पूर्णिमा के दिन माँ शाकम्भरी का प्रादुर्भाव हुआ था। अतः पौष पूर्णिमा के दिन माँ शाकम्भरी जयंती महोत्सव मनाई जाती है।

 

माँ शाकम्भरी की कथा

एक समय की बात है जब दुर्गम नाम का एक महान दैत्य रहता था जिसके पिता का नाम राजरुरु था। एक बार दुर्गम दैत्य के मन में विचार आया की शायद देवताओं का बल वेद है क्यों ना वेद को ही नष्ट कर दिया जाए। यदि वेद लुप्त हो जाएगा तो देवता लोग भी लुप्त हो जाएंगे। यह सोच कर दुर्गम दैत्य तपस्या करने के विचार से हिमालय पर्वत पर गया।

ॐ ब्रह्मणे नमः का जाप करते हुए उसने हिमालय पर अपना आसान टिका लिया। दुर्गम दैत्य ने हजार वर्षो तक भगवान ब्रह्मा जी की कठिन तपस्या की। देवता गण दुर्गम की तप को देखकर संतप्त हो उठे।

दुर्गम की कठिन तपस्या से भगवान ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और हंस पर सवार होकर दुर्गम के पास आकर बोले, आँखे खोलो वत्स। आज तुम्हारा तप पूर्ण हुआ। मन में जो वर की अभिलाषा है, उसे मांगो वत्स। भगवान ब्रह्मा जी की वाणी सुन दुर्गम ने अपने आँखे खोली। उनका अभिवादन करते हुए बोला, हे प्रभु मुझे सम्पूर्ण वेद प्रदान करें और इतनी शक्ति प्रदान करें कि मैं देवताओ को युद्ध क्षेत्र में पराजित कर संकू। दुर्गम की भक्ति और तप के समक्ष भगवान ब्रह्मा जी विवश हो गए और अंततः “ऐसा ही हो” कहते हुए ब्रह्मा जी ब्रह्मलोक चले गए।

दुर्गम को वरदान देने के कारण भगवान ब्रह्मा जी को समस्त वेदो का ज्ञान शून्य हो गया। समस्त ब्रह्माण्ड में हाहाकार मच गया तब देवता और ब्राह्मण गण कल्याणस्वरूपिणी भगवती जगदम्बा की उपासना करने के विचार से हिमालय पर्वत पर गये। सभी देवता और ब्राह्मण गण ने स्तुति और ध्यान कर माँ भगवती को इस विघ्न से अवगत कराया। उन्होंने माँ की स्तुति करते हुए कहा हे माँ, प्रसन्न हो जाओ। हम सब आपको बार-बार प्रणाम करते है। आप जो चाहो वो हो जाए फिर क्यों समस्त मानव जगत के प्राणी को दुःख में देख रही है।

हमलोगों को इस महान दैत्य से मुक्ति प्रदान करें। इस प्रकार देवताओ और ब्राह्मणो की प्रार्थना को स्वीकार करते हुए माँ भगवती शाकम्भरी के रूप में प्रकट हुई। देवी माँ आपको नमस्कार हो, समस्त मानव जाति के कल्याण हेतु आप प्रकट हुई अतः समस्त मानव जाति का नमस्कार स्वीकार हो। हे माँ, हमलोग भूख से अत्यंत पीड़ित होने के कारण आपकी विशेष स्तुति करने में असमर्थ है।

हे अम्बे, जगदम्बे, आप दुर्गम नामक दैत्य से वेद छुड़ा लेन की कृपा करें जिससे समस्त ब्रह्माण्ड का कल्याण हो। देवताओ और ब्राह्मणो की याचना सुन माँ शाकम्भरी ने अनेक प्रकार के शाक तथा स्वादिष्ट फल उन्हें खाने के लिए दिये और भांति-भांति के अन्न और पशुओ को खाने के लिए भी नवीन तृण प्रदान की। इस दिन से ही माँ शाकम्भरी के नाम से जानी गयी। जगत में माँ शाकम्भरी के प्रादुर्भाव का जय-जयकार होने लगा।

इस बात की सुचना पाते ही दुर्गम नामक दैत्य ने अपनी सेना को सजाया और अश्त्र-शस्त्र से सुसज्जित होकर माँ शाकम्भरी को युद्ध हेतु ललकारने लगा। तदुपरांत, माँ शाकम्भरी चक्र, गदा, धनुष-बाण, त्रिशूल आदि धारण कर रणभूमि में दुर्गम का वध करने आ गयी। माँ शाकम्भरी अति क्रोधित थी सारा ब्रह्माण्ड थर-थर काँप रहा था।

रण में देवताओ और राक्षसो के बीच भयंकर युद्ध हुआ। माँ शाकम्भरी की शक्ति से प्रेरित माया ने दुर्गम के विशाल राक्षसी सेना को पल में नष्ट कर दिया तब दैत्य दुर्गम स्वंय माँ शाकम्भरी के सामने प्रकट हुआ और माँ से युद्ध करने लगा। माँ शाकम्भरी के बाण दैत्य दुर्गम के छाती में जाकर अटकी तब रुधिर दैत्य दुर्गम माँ भगवती के सामने प्राणहीन हो गया।

दैत्य दुर्गम के वध होने के पश्चात तीनो लोको में माँ भगवती की जय-जयकार होने लगा। देवता और ब्राह्मण गण माँ शाकम्भरी की वंदना करने लगे शतलोचने, माँ शाकम्भरी आपको शत शत नमस्कार है। कल्याण-स्वरूपिणी भगवती माँ शाकम्भरी तुम्हे बारम्बार नमस्कार है।

माता शाकम्भरी की पूजा विधि

पौष माह, शुक्ल पक्ष की सप्तमी के दिन से पौष पूर्णिमा तक माँ शाकम्भरी नवरात्रि मनाई जाती है। पौष माह की पूर्णिमा को ही माँ शाकम्भरी का प्रादुर्भाव हुआ था। अतः भक्त गणो को पौष माह की शुक्ल पक्ष की सप्तमी से माँ शाकम्भरी की पूजा-अर्चना शारदीय नवरात्र की तरह करना चाहिए।

मासिक दुर्गाष्टमी की कथा एवं इतिहास

 प्रतिदिन स्नानादि से निवृत होकर माँ की पूजा-अर्चना एवम आरती करना चाहिए। दुर्गा चालीसा का पाठ प्रतिदिन करें और माँ भगवती की स्तुति करे। विधि पूर्वक माँ शाकम्भरी की पौष माह के सप्तमी से पूर्णिमा तक 9 दिन पूजा-अर्चना, स्तुति, आराधना और आरती करने से माँ अति प्रसन्न होती है और समस्त दुखों और कष्टों को दूर कर मनोवांछित फल देती है। इस प्रकार माँ शाकम्भरी की कथा सम्पन्न हुई । भक्त गण प्रेम से बोलिए माँ भगवती के रूप माँ शाकम्भरी की जय।

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