Kirodi dham
किरोडी धाम
राजस्थान मे काफी तीर्थ-स्थान है जो अपने आप मे अपनी कहानी बयां करते है । इन्ही मे से एक है झुन्झुनूं जिले की चिराणा पंचायत का अरावली की पहाडियों से घिरा तीर्थ स्थल “किरोडी धाम”
ऐतिहासिक विवरण:
अगर हम बात करे किरोडी धाम के उदगम् की तो ज्योतिषाचार्य श्री रणजीत स्वामी बताते है की वैंकटेश्वर प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘लोहार्गल महातम्य’ तथा “पदमपुराण’ मे किरोडी का उल्लेख तीर्थ के रूप मे किया गया है । ककोर्टक नामक नाग ने सघन वृक्षावली व झरनों के मध्य यहां तपस्या की थी । कुलीन वंश के इस तपस्वी नाग को तपश्चर्या के दौरान रिषी द्वारा वरदान प्रदान किया तथा इस तीर्थ को कर्कोटिका नाम भी दिया ।
एक अन्य दृष्टांत के अनुसार महाभारत युद्ध के पश्चात पाण्डवो ने अपने सगोत्रियों की हत्या के पाप से छुटकारा पाने के लिये इस क्षैत्र मे तीर्थो का भ्रमण किया था तथा पास ही स्थित लोहार्गल पहुंचे जहां उनके लोहे से बने अस्त्र-शस्त्र गलने लगे । इनके गलने से ही इस तीर्थ का नाम लोहार्गल पडा । बताया जाता है कि पाण्डवो की माता कुन्ती ने अपने मानसिक विवाद के निवारण के लिये पवित्र स्थल किरोडी तीर्थ मे तपस्या प्रारम्भ की जहां उनको काफी शांति मिली ।
अजब है गर्म व ठण्डे पानी की माया
प्रकृति की अदभुद् देन किरोडी धाम मे पाण्डवो की माता कुन्ति की चरण पादुकायें गर्म जल के कुण्ड पर आज भी स्थित है तथा कुण्डो मे झरनों के शीतल व गर्म जल का प्रवाह निरन्तर बना रहता है अब एक कुण्ड मे शीतल तथा दूसरे कुण्ड मे गर्म जल विद्यमान है । किरोडी मे एक ही स्थान पर गर्म व ठंडे जल के झरने है स्नान की सुविधा के लिये झरनो को पा़ँच कदम की की दुरी पर दो कुण्डो मे विभाजित कर दिया गया ।
अरावली की पहाडियों मे प्रकृती की गोद मे बसा है किरोडी तीर्थ
शेखावाटी का आबू तीर्थ-स्थल किरोडी धाम लोहार्गल की चोबीस कोसीय परिक्रमा का प्रथम पडाव है। चिराणा से किरोडी की घुमावदार घाटी मे खडी चढ़ाई के कारण थोडी कठिनाईयां होती है परन्तु प्राकृतिक दृश्यावली के कारण कठिनाईयां महसूस नही होती यहां का सुरम्य वातावरण हरियाली से लदे पहाड बहुत ही मनमोहक है यहा देशी-विदेशी पर्यटक आते रहते है ।
दर्शनीय स्थल व मंदिरो का इतिहास प्राचीनता के साथ भी जुडा है
किरोडी मे प्रसिद्ध मंदिर श्री गिरधारी जी का है । ज्योतिषाचार्य श्री रणजीत स्वामी के अनुसार इसका निर्माण संवत् 1652 से 1684 के बीच हुआ तत्पश्चात वैशाख सुदी तृतिया (अक्षय त्रितिया) सवंत 1684 को मुर्ति स्थापना हुई । मंदिर मे भगवान कृष्ण व राधा की काली व सफेद चित्ताकर्षक मुर्तियां विराजमान है मन्दिर व्यवस्था हेतु लगभग 250 बीघा जमीन जागीर के रूप मे प्रदान की गई । मंदिर मे महंत परम्परा के चलते यहां के महंत को 108 की उपाधि से विभुषित किया जाता है । स्वतंत्रता के पश्चात जागीर होने के बाद मंदिर के प्रथम महंत श्री 108 गोवर्धन दास जी थे वर्तमान मे महंत श्री 108 राधेश्याम दास है जो की तीर्थ स्थल के व्यवस्थापक भी है ।
अन्य मंदिरो मे गंगा माता का मंदिर है व दर्शनीय स्थलों मे उदयपुरवाटी के राजा टोडरमल व उनके मुनीम मुनसाह की छतरिया स्थित है।
साथ ही हिन्दु-मुस्लिम समन्वय की प्रतीक पीर बाबा की दरगाह भी स्थित है जो करीब 400 साल पुरानी है साथ ही साथ बरखण्डी बाबा का आश्रम व हनुमान मंदिर भी अपने आप मे दर्शनीय है । यहां कल्पवृक्ष के पेड़ है जहां कई लोग दर्शन करने आते है । हनुमान मंदिर के पास ही नवलगढ के प्रसिद्ध उधोगपती कमल मोरारका द्वारा एक यात्री निवास बनाया गया है ।
कैसे पहुंचे किरोडी
किरोडी राजस्थान के सीकर-नीमकाथाना-दिल्ली रोड पर रोड से पांच किलोमीटर अंदर की तरफ स्थित है । किरोडी पहुंचने के लिये दो रास्ते है , प्रथम चिराणा से पहाडी रास्ता जो की पहाडी घाटी से होकर आता है
दुसरा उदयपुरवाटी से पांच किलोमिटर का सडक मार्ग है । सीकर उदयपुरवाटी रोड पर किरोडी के लिये सडक निकलती है जहां नवलगढ़ के उद्दोगपती कमल मोरारका द्वारा द्वार भी बनाया गया है ।
कैसा है जनसंख्या घनत्व व रहन-सहन
किरोडी मे तीन सौ से उपर तक परिवारों की संख्या निवास करती है ।परन्तु पहाडी संग होने के कारण कृषी योग्य भूमि बहुत कम है । यहां के युवा काफी संख्या मे नोकरी करते है शिक्षा विभाग, सैना,विद्दुत विभाग,वन विभाग,चिकित्सा एवं जलदाय विभाग आदी मे कार्यरत है । यहां स्वामी परिवार अधिक है साथ ही माली,गुर्जर,मीणा,बलाई,सांसी, बावरिया व जोगी परिवार है । तत्कालीन महंत के द्वारा बताया गया है की वि. स. 1144 मे खण्डेला राजा के भाणजो द्वारा स्थित किया गया था । उस समय यहा ब्राम्हण, राजपूत, पुरोहित, कुम्हार, धोबी, माली आदी जातीयां रहती थी ।