LOHARGAL
लोहार्गल
लोहार्गल तीर्थ सूर्य कुण्ड, यह वही पवित्र तीर्थ है, जब पांडु पुत्र युधिष्ठिर ने अपनी कुटुम्ब हत्या से मुक्त होने के लिये ब्रह्मर्षि नारद जी से उपाय पुछा तो नारद मुनी जी ने बताया की – ‘हे महाभाग जहाँ पर भीमसेन की महत्ती गदा द्रवीभुत हो जाए उस तीर्थ में स्नान करने से सुखपूर्वक इस गोत्र हत्या सम्बंधी पाप से आप मुक्त हो जायेंगे‘। देवर्षि नारद का यह कथन सुनकर युधिष्ठिर आदि पाण्डु पुत्र अत्यन्त प्रसन्न हुए और तीर्थाटन हेतु प्रस्थान कर गये।
कुरूक्षेत्र से प्रारम्भ कर समस्त तीर्थों का पर्यटन करते हुये पाण्डव श्री मालकेतु पर्वत पर स्थित कान्तिपुरी मे कुछ दिन प्रवास करने हेतु आ गये।
एक दिन महाराज युधिष्ठिर भीम आदि भाईयों के साथ शिकार खेलने हेतु गहन वन मे प्रविष्ट हो गये।
शिकार खेलते खेलते जब वे लोग भुख प्यास से व्याकुल हो कर जलाशय ढूंढने लगे तो उन्हे एक कुण्ड दिखाई पड़ा। कुण्ड के आस पास का दृश्य से ऐसा महसुस हुआ की ये कोई मनोहर तीर्थ है। इसके चारो तरह माला के समान ऋषियों के आश्रम बने हुये थे।समस्त ऋषियों को प्रणाम कर तथा उनसे आज्ञा लेकर महाराज युधिष्ठिर ने अपने भाईयों समेत उस सूर्य कुण्ड तीर्थ लोहार्गल मे स्नान किया।
महाबली भीमसेन ने अपनी गदा को उस सुर्य कुण्ड मे घोया तो वह द्रवीभुत होकर हल्की हो गई, यह द्ख कर महाराज युधिष्ठिर अत्यन्त प्रसन्न हुए की आज इस तीर्थ मे स्नान करने से हम लोग गोत्र हत्या से मुक्त हो गये।