नाथ जी

मन्दिर मे सेवा पुजा का समस्त कार्य ब्राह्मण करते है परन्तु यहाँ की महंत गद्दी पर दीर्घ काल से नाथ सम्प्रदायानुयायियो का अधिकार रहा है। तथापि विदित होता है कि प्राचीनकाल मे यहाँ सेवा पुजा का कार्य गुर्जर जाति के भोपा लोग किया करते थे

    किंवदन्ती प्रसिद्ध है कि किसी समय यहाँ पर्वत के दक्षिण भाग की परली दलान मे 6 K. M दुर स्थित प्राचीन गाँव हथियाज के भैरव मन्दिर के जालजी नामक भोपा देवी की पुजा हेतु आया करते थे।इसी समय यहाँ नाथ सम्प्रदाय मे दीक्षित सिद्ध महात्मा  शिवनाथ जी महाराज विचरण  करते हुये आ गये ओर  माताजी के मन्दिर के पास ही अपना आसन और धुणां लगा लिया, शिवनाथ जी महाराज किसी काश्मीर नरेश के पुत्र थे। कालांतर मे जालजी ओर शिवनाथ जी के बीच मित्रता हो गई तब जालजी यहाँ प्रतिदिन न आकर यदा कदा आने लगे क्योकि माताजी की पुजा सेवा का कार्य नियमित रूप से शिवनाथ जी कर देते थे

जालजी भैरव भक्त ओर सिद्ध  पुरूष थेएक दिन उन्होने अपने शरीर को कुत्ते के रूप मे बदल कर दिखाया ओर शिवनाथ जी से आग्रह किया की वे भी अपने आप को दुसरे किसी प्राणी के रूप मे बदल कर दिखाए,तब भक्त शिवनाथ जी ने उनको अपनी पवित्र छड़ी दी ओर कहा कि मै दुसरा रूप धारण करूगाँ तब यह छड़ी छुआ देना जिससे मै पुनः मेरा यह रूप धारण कर लुगाँ। यह कह कर शिवनाथ जी  अपने आप को सिंह रूप मे बदल लियासिंह को  सामने देख जालजी  घबरा गये ओर छड़ी को हाथ मे लेकर एक पेड़ पर चढ़ गये। इधर सिहं विचरण करता हुआ जगंल मे चला गया।

     शिवनाथ जी महाराज के दस शिष्य थे जो उस समय भिक्षाठन को  गये थे ,काफी समय के बाद जब वे लोटे तो जालजी ने सारा वर्तान्त सुनाया तब शिष्य गण ओर जालजी सिहं रूपी शिवनाथ जी को जगंल मे खोजने निकल पड़े काफी देर बाद माताजी  के मन्दिर के कुछ दुर पश्चिम स्थित कोहकुण्ड नामक स्थान पर उनको सिहं के रूप मे बैठे हुये नाथजी दिखाई दिये, तब शिष्यगण उनके पास गये  ओर पवित्र छड़ी को उनसे छुआ दिया जिससे वे अपने पुर्व रूप मे आ गये,अपने पुर्व रूप में आने के पश्चात शिवनाथ जी ने कहा कि अब मेरी जीवित रहने की इच्छा नही है क्योकि सिहं रुप मे मैने एक गाय का वध कर दिया अतः मै यही जीवित समाधि लुंगा। नाथजी की यह बात सुनकर शिष्यो ने कहा कि हम सब भी आपके साथ ही जीवित समाधि लेगे, जालजी को बहुत पश्चाताप हो रहा था उन्होने दुखी होकर कहा महाराज आप सब लोग समाधि ले लेगे तो माताजी की सेवा पुजा कोन करेगा क्योकि अब मै यहॉ कभी नही आऊगाँ, चब नाथजी ने एक शिष्य को माताजी की सेवा पुजा निमित जीवित रहने का हुकुम दिया। इस प्रकार शिवनाथजी महाराज व नौ शिष्यो ने माघ शुक्ला द्वितिया को जीवित समाधि ले ली

      शिवनाथ जी महाराज के जिस शिष्य ने समाधि नही ली वह माताजी की सेवा पुजा करने लगा ओर बाद मे मन्दिर की महंत गद्दी पर उनकी शिष्य परंपरा  का अधिकार रहा जो वर्तमान मे भी चल रहा है । इस शिष्य परंपरा मे  हुये मन्दिर के सभी महंते के नाम

English EN Hindi HI
Wordpress Social Share Plugin powered by Ultimatelysocial
Facebook
Instagram
Telegram
WhatsApp